Catalogo · 9789350000014
Iṃsāna kā nasībā
हालाँकि प्रख्यात रूसी उपन्यासकार शोलोखोव की ख्याति उनके महाकाव्यात्मक उपन्यास 'धीरे बहे दोन रे' पर आधारित है लेकिन उन्होंने कुछ ऐसी अपेक्षाकृत छोटे कलेवर की कथा-कृतियाँ भी रची हैं जो रूसी गृह युद्ध के अलावा दूसरी उथल-पुथल का चित्रण करती हैं। 'इन्सान का नसीबा' ऐसा ही एक लघु उपन्यास है जो युद्ध की विभीषिका का और उस विभीषिका के बीच मनुष्य की जिजीविषा और सामान्य जनों की मानवीयता का अप्रतिम चित्रण करता है। इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र एक ड्राइवर है जो दूसरे महायुद्ध के दौरान अपनी पत्नी और बच्चों को गँवा बैठता है। न सिर्फ यह बल्कि वह जर्मनों के हाथ पड़ कर तरह-तरह की यातनाओं से भी गुजरता है। इसके बावजूद जीवन और उसकी गरिमा में उसकी आस्था कम नहीं होती। वह युद्ध में अपने माता-पिता गँवा बैठने वाले एक अनाथ बालक को एक तरह से गोद ले लेता है और पालने लगता है। युद्ध की विभीषिका के शिकार दो अभागे इस प्रकार साथ आ मिलते हैं और एक-दूसरे के जीवन के अभाव के पूरक बन जाते हैं। शोलोखोव ने अपनी सहज-सरल शैली में इस ड्राइवर और उस अनाथ बालक की कहानी कही है जो शैली कि रूसी कथाकारों की उस महान परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जो पुश्किन और लेर्मोन्तोव से शुरू हो कर तॉल्स्तॉय और दोस्तोयेव्स्की से होती हुई शोलोखोव तक आयी है। जाने-माने अनुवादक मदनलाल 'मधु' ने इस लघु उपन्यास का हिन्दी रूपान्तर बोल-चाल की शैली में किया है और उसे सहज पठनीय बना दिया है
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